Saturday, May 9, 2009
लोग परेशां है…
अब तू ही बता ऐ ‘राहुल’, खजाना-ऐ-मोहब्बत कोई संभाले कैसे.
मन …
मन,
सूक्ष्म विचारों मे खोया हुआ,
न जाने कहाँ कहाँ भ्रमण करता है.
कभी ये तुम्हे मेरे इतने करीब ला देता है,
की मैं अपनी साँसों को तुममे और,
तुम्हारी साँसों को अपने मैं पाता हूँ,
और कभी तुम मुझसे इतने दूर हो,
की मेरे लाख चिल्लाने के बाद,
बुलाने के बाद भी,
तुम मुझे नहीं सुनते और,
आँखों से ओझल हो जाते हो.
ये मन ही है जो कभी मुझको तुम्हारे रूप का,
अस्तित्व का बोध कराता है.
ये मन ही है जो मुझे तुमसे बांधे हुए है,
जो मुझे तुमसे जोड़ता है.
ये मन ही है जो मुझे अहसास कराता है की,
‘मैं’ ही ‘तुम’ हो और ‘तुम’ ही ‘मैं’ हूँ.
ये मेरा मन.
मन …
मन,
सूक्ष्म विचारों मे खोया हुआ,
न जाने कहाँ कहाँ भ्रमण करता है.
कभी ये तुम्हे मेरे इतने करीब ला देता है,
की मैं अपनी साँसों को तुममे और,
तुम्हारी साँसों को अपने मैं पाता हूँ,
और कभी तुम मुझसे इतने दूर हो,
की मेरे लाख चिल्लाने के बाद,
बुलाने के बाद भी,
तुम मुझे नहीं सुनते और,
आँखों से ओझल हो जाते हो.
ये मन ही है जो कभी मुझको तुम्हारे रूप का,
अस्तित्व का बोध कराता है.
ये मन ही है जो मुझे तुमसे बांधे हुए है,
जो मुझे तुमसे जोड़ता है.
ये मन ही है जो मुझे अहसास कराता है की,
‘मैं’ ही ‘तुम’ हो और ‘तुम’ ही ‘मैं’ हूँ.
ये मेरा मन.
वो पल, वो लम्हा…
“आज भी याद है मुझे
वो पल, वो लम्हा,
जब तुमने कंधे पर हाथ रखकर,
मुझे आवाज़ दी थी,
मुझे रोकने को या फिर मुझे साथ लेकर चलने को.”
दूरी….
“मैं,
सूरज की तपिश को ,
पवन के वेग को ,
पर्वतों की ऊंचाई को,
धरा की बिप्दायो को ,
सब सह लूँगा.
क्योंकि
या तो मैं मर जाऊंगा,
या नए तेज़ के साथ जी उठूँगा .
पर,
मैं तुझसे दूरी नहीं सह पाउँगा ,
क्योंकि,
तेरी यादें मुझे मरने नहीं देंगी,
और तेरी जुदाई मुझे जीने.”
Some Thing Motivational...
“परिंदों से मौज लेकर तुम भी अपने पर फैलाओ,
एक दिन आसमां भी तुम्हारी ऊंचाई देखेगा…”